बैंड बाजा बेटियां : 'बेटी है तो सच में कल है', समाज की मानसिकता और सिनेमा के जरिए संदेश


मुंबई, 19 फरवरी (आईएएनएस)। अक्सर अखबारों में खबरें आती हैं कि दहेज के लिए बहू को प्रताड़ित किया गया या फिर ससुराल में ज्यादती से तंग आकर महिला ने जान दे दी।

ऐसी खबरें समाज के लिए इतनी आम हो चुकी हैं कि लगभग इनका हमारे जीवन पर असर पड़ना बंद हो चुका है। इसका असर सिर्फ उन घरों के चुनिंदा लोगों पर पड़ता है, जो वाकई घटना से जुड़े होते हैं, बाकी समाज और परिवार के लोग दोष सिर्फ लड़कियों में ढूंढते हैं।

बेटी की शादी करने के बाद बहुत कम ही माता-पिता होते हैं, जो मुसीबत में समाज के तानों से लड़कर बेटी को सम्मानजनक तरीके से घर वापस लाते हैं और उसे गौरवशाली जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हैं।

यूपी के कुछ इलाकों में ऐसी प्रेरणादायक घटनाओं के बारे में दिखाया गया, जहां घरेलू हिंसा से परेशान बेटी को पिता बैंड-बाजे के साथ अपने घर लेकर आया हो। यह परिवर्तन भी समाज में आया है, लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है। ऐसी ही पिता और बेटी के मार्मिक रिश्ते को दिखाती है गजराज राव की फिल्म ‘बैंड बाजा बेटियां’। जिसकी पहली ही झलक ने सोशल मीडिया पर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

फिल्म की पहली ही क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है और हर कोई फिल्म को क्रांति बता रहा है। मेकर्स द्वारा जारी की गई वीडियो में एक पिता कैसे समाज और अपने ही परिवार की महिलाओं द्वारा ‘अब वो दूसरे घर की जिम्मेदारी है,’ ‘पराया धन है,’ ‘जो उसकी किस्मत में लिखा है,’ या फिर ‘हमारी जिम्मेदारी खत्म’ जैसी बातें सुनता है, लेकिन बेटी का दर्द इन सब से ऊपर है। कहानी में पिता बैंड-बाजे के साथ विदा हुई बेटी को दोबारा घर लेकर आता है। यह फिल्म साधारण होते हुए भी अद्वितीय है, जो समाज में शादी के बाद बेटियों के प्रति सोच पर सवाल करती है।

‘बैंड बाजा बेटियां’ कब रिलीज होने वाली है, इसको लेकर डेट का ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन फिल्म में कई छोटे किरदारों को शामिल किया गया है, जो मध्यम वर्ग की कहानी को बखूबी पर्दे पर निभा रहे हैं। फिल्म में कुछ नए किरदार भी देखने को मिलने वाले हैं।

–आईएएनएस

पीएस/एबीएम


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