परीक्षा से पहले जलाई मार्कशीट और सेवा को चुना जीवन, विनायक से विनोबा भावे बनने की कहानी


नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। साल 1916 की एक दोपहर थी। एक छात्र विनायक इंटरमीडिएट की परीक्षा देने के लिए बॉम्बे (मुंबई) जा रहा था। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उसके मन में गहरा द्वंद्व था। अचानक उसने एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी कल्पना कोई साधारण छात्र नहीं कर सकता था।

दरअसल 1916 में विनोबा भावे ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में महात्मा गांधी द्वारा दिए गए एक भाषण की रिपोर्ट अखबार में पढ़ी थी। इस भाषण ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा छोड़ने का निर्णय ले लिया।

25 मार्च 1916 को, जब वे अपनी ‘इंटरमीडिएट’ परीक्षा देने के लिए मुंबई जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में ही स्कूल के उन सभी प्रमाणपत्रों को आग के हवाले कर दिया जिन्हें लोग भविष्य की चाबी मानते थे। यह कोई गुस्से में उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि एक ‘ऋषि’ के जन्म की पदचाप थी। उन्होंने परीक्षा में बैठने के बजाय बनारस जाकर संस्कृत का अध्ययन करने और बाद में गांधीजी से मिलने का फैसला किया।

इसके बाद वे 7 जून 1916 को अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में गांधीजी से मिले और उनके शिष्य बन गए। वह विनायक ही आगे चलकर ‘विनोबा’ बना, जिसे महात्मा गांधी ने अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी घोषित किया।

आज जब हम भारत के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को देखते हैं, तो वर्ष 1983 में 25 जनवरी को एक स्वर्णिम अध्याय की तरह चमकता है, जब इस महान तपस्वी को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।

विनायक नरहरि भावे का ‘विनोबा’ बनना उनके प्रखर आध्यात्मिक झुकाव, गृहत्याग, और गांधी के विचारों के प्रति समर्पण का परिणाम था। 1916 में गांधी से मिलने के बाद उनके सेवा भाव और सरलता से प्रभावित होकर, आश्रम के सदस्यों ने विनायक को सम्मानपूर्वक ‘विनोबा’ (एक आदरणीय पारंपरिक नाम) कहना शुरू कर दिया।

11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के गागोदे गांव में जन्मे विनायक नरहरि भावे के व्यक्तित्व में गजब का विरोधाभास था। उनके पिता नरहरि शंभू राव एक आधुनिक और तर्कशील बुनकर थे, तो मां रुक्मिणी देवी भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्रतिमूर्ति थीं। विनायक ने पिता से गणित की सूक्ष्मता और माता से उपनिषदों की गहराई सीखी।

महात्मा गांधी के साथ उनकी पहली मुलाकात 1916 में हुई। गांधी ने तत्काल पहचान लिया कि यह साधारण युवक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक हीरा है। आश्रम के एक साथी ने उन्हें ‘विनोबा’ नाम दिया और देखते ही देखते यह नाम अहिंसा और सेवा का पर्याय बन गया। गांधी विनोबा से इतने प्रभावित थे कि 1940 में जब ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ शुरू हुआ, तो उन्होंने पंडित नेहरू से पहले विनोबा को प्रथम सत्याग्रही चुना।

आजाद भारत के इतिहास में 18 अप्रैल 1951 का दिन कभी नहीं भुलाया जा सकता। तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में विनोबा ने देखा कि कुछ दलित परिवार खेती के लिए जमीन मांग रहे हैं। विनोबा ने गांव के लोगों से अपील की तभी एक जमींदार, वेदिरे रामचंद्र रेड्डी उठे और अपनी 100 एकड़ जमीन स्वेच्छा से दान कर दी।

यहीं से ‘भूदान आंदोलन’ का जन्म हुआ। विनोबा ने इसे ‘यज्ञ’ कहा। वे अगले 13 वर्षों तक पैदल चलते रहे। कल्पना कीजिए, एक बुजुर्ग व्यक्ति लाठी के सहारे पूरे भारत की खाक छान रहा है और लोगों के दिलों को पिघलाकर उनसे जमीन मांग रहा है। उनका तर्क सरल था, “आप मुझे बेटा मानकर अपनी जमीन का छठा हिस्सा दें।” परिणामस्वरूप, लगभग 44 लाख एकड़ जमीन स्वेच्छा से दान में मिली। यह दुनिया की सबसे बड़ी अहिंसक भूमि सुधार क्रांति थी।

–आईएएनएस

वीकेयू/वीसी


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